श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  12.56.38 
बार्हस्पत्ये च शास्त्रे च श्लोको निगदित: पुरा।
अस्मिन्नर्थे महाराज तन्मे निगदत: शृणु॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
महाराज! इसी बात के समर्थन में बार्हस्पत्य शास्त्र का एक प्राचीन श्लोक सुनाया जाता है। मैं तुम्हें उसके बारे में बताता हूँ, सुनो। 38।
 
Maharaj! In support of this very thing an ancient verse of Barhaspatya Shastra is recited. I am telling you about it, listen. 38.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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