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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष
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श्लोक 36
श्लोक
12.56.36
तस्मान्नित्यं दया कार्या चातुर्वर्ण्ये विपश्चिता।
धर्मात्मा सत्यवाक् चैव राजा रञ्जयति प्रजा:॥ ३६॥
अनुवाद
अतः विद्वान राजा को चारों वर्णों पर सदैव दया करनी चाहिए, धर्मात्मा और सत्यनिष्ठ राजा ही अपनी प्रजा को सुखी रख सकता है ॥36॥
Therefore, a learned king should always have mercy on all four castes, only a righteous and truthful king can keep his people happy. 36॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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