श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.56.35 
दुर्गेषु च महाराज षट्सु ये शास्त्रनिश्चिता:।
सर्वदुर्गेषु मन्यन्ते नरदुर्गं सुदुस्तरम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
महाराज! मरुस्थल (जलरहित भूमि), जल, थल, वन, पर्वत और मानव - इन छह प्रकार के दुर्गों में मानव दुर्ग सबसे श्रेष्ठ है। शास्त्रों के तत्त्व को जानने वाले विद्वान उपर्युक्त सभी दुर्गों में मानव दुर्ग को सबसे अधिक दुर्भेद्य मानते हैं ॥ 35॥
 
Maharaj! Of the six types of forts - desert (waterless land), water, earth, forest, mountain and human - the human fort is the most important. Scholars who know the principles of the scriptures consider the human fort to be the most impregnable of all the above mentioned forts. ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)