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mahabharat 12.56.34: जो पुरुष ब्राह्मणों के प्रति भक्ति रखते हैं, वे सभी के प्रिय होते हैं। राजाओं के लिए ब्राह्मणभक्तों के संग्रह से बढ़कर कोई धन नहीं है। 34.   |   mahabharat अध्याय 12.56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  12.56.34 
दयिताश्च नरास्ते स्युर्भक्तिमन्तो द्विजेषु ये।
न कोश: परमोऽन्योऽस्ति राज्ञां पुरुषसंचयात्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जो पुरुष ब्राह्मणों के प्रति भक्ति रखते हैं, वे सभी के प्रिय होते हैं। राजाओं के लिए ब्राह्मणभक्तों के संग्रह से बढ़कर कोई धन नहीं है। 34.
 
Those men who have devotion towards brahmanas are loved by all. For kings there is no greater treasure than the collection of devotees of brahmanas. 34.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)