श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  12.56.31 
एवं चैव नरश्रेष्ठ रक्ष्या एव द्विजातय:।
सापराधानपि हि तान् विषयान्ते समुत्सृजेत्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ! इतना सब होने पर भी ब्राह्मणों की सदैव रक्षा करनी चाहिए; यदि वे कोई अपराध करें तो उन्हें मृत्युदंड देने के स्थान पर अपने राज्य की सीमा से बाहर निकाल देना चाहिए ॥31॥
 
O best of men! In spite of all this, brahmins must always be protected; if they commit a crime, then instead of giving them death penalty they should be expelled from the boundaries of your kingdom. ॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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