श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.56.3 
राजधर्मान् विशेषेण कथयस्व पितामह।
सर्वस्य जीवलोकस्य राजधर्म: परायणम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
पितामह! राजधर्म ही सम्पूर्ण चराचर जगत के लिए परम आश्रय है; अतः आप कृपा करके राजधर्मों का विशेष रूप से वर्णन करें॥3॥
 
Grandfather! Rajdharma is the ultimate shelter for the entire living world; Therefore, please especially describe the royal religions. 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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