श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  12.56.24 
अद्भॺोऽग्निर्ब्रह्मत: क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम्।
तेषां सर्वत्रगं तेज: स्वासु योनिषु शाम्यति॥ २४॥
 
 
अनुवाद
अग्नि जल से, क्षत्रिय ब्राह्मण से और लोहा पत्थर से उत्पन्न हुआ है। इनका तेज सर्वत्र अपना प्रभाव दिखाता है; किन्तु जब वह अपने उत्पन्न करने वाले कारण से टकराता है, तो स्वतः ही शांत हो जाता है।
 
‘Agni has emerged from water, Kshatriya from Brahmin and iron from stone. Their brilliance shows its effect everywhere; but when it collides with the cause that created it, it calms down on its own.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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