श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.56.21 
मृदुर्हि राजा सततं लङ्घॺो भवति सर्वश:।
तीक्ष्णाच्चोद्विजते लोकस्तस्मादुभयमाश्रय॥ २१॥
 
 
अनुवाद
जो राजा सब प्रकार से मृदुल रहता है, उसकी आज्ञा का लोग उल्लंघन करते हैं, और यदि वह कठोरता से भी व्यवहार करे, तो सब लोग क्षुब्ध हो जाते हैं। अतः तुम्हें आवश्यकतानुसार कठोरता और मृदुलता दोनों को अपनाना चाहिए ॥21॥
 
People disobey the orders of a king who is always gentle in every respect, and even if he behaves harshly, everyone becomes agitated. Therefore, you should adopt both harshness and gentleness as per the need. ॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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