श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.56.2 
युधिष्ठिर उवाच
राज्ञां वै परमो धर्म इति धर्मविदो विदु:।
महान्तमेतं भारं च मन्ये तद् ब्रूहि पार्थिव॥ २॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, "पितामह! धर्म के विद्वानों का मत है कि राजा का धर्म ही श्रेष्ठ है। मैं इसे बहुत बड़ा भार समझता हूँ, इसलिए हे राजन! आप मुझे राजा के धर्म का उपदेश दीजिए।"
 
Yudhishthira said, "Grandfather! It is the belief of the learned men of Dharma that the Dharma of kings is the best. I consider this a very big burden, therefore, O King! You please preach me the Dharma of the king."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)