श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.56.19 
गुणवान् शीलवान् दान्तो मृदुर्धर्म्यो जितेन्द्रिय:।
सुदर्श: स्थूललक्ष्यश्च न भ्रश्येत सदा श्रिय:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
जो राजा सदाचारी, सुशील, मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाला, सौम्य स्वभाव वाला, धर्मपरायण, उत्तम इन्द्रियों वाला, देखने में सुन्दर और दान देने में उदार है, वह राजलक्ष्मी कभी भ्रष्ट नहीं होती ॥19॥
 
The king who is virtuous, well-mannered, who keeps his mind and senses under control, has a gentle nature, is pious, has good senses, is pleasant to look at and generous in giving a lot, is never corrupted by Raja Lakshmi. 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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