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mahabharat 12.56.15: यद्यपि भाग्य और पुरुषार्थ, किसी कार्य की सफलता के दो सामान्य कारण माने जाते हैं, तथापि मैं पुरुषार्थ को ही सबसे महत्वपूर्ण मानता हूँ। भाग्य को पहले से ही निश्चित कहा गया है॥15॥   |   mahabharat अध्याय 12.56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.56.15 
साधारणं द्वयं ह्येतद् दैवमुत्थानमेव च।
पौरुषं हि परं मन्ये दैवं निश्चितमुच्यते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि भाग्य और पुरुषार्थ, किसी कार्य की सफलता के दो सामान्य कारण माने जाते हैं, तथापि मैं पुरुषार्थ को ही सबसे महत्वपूर्ण मानता हूँ। भाग्य को पहले से ही निश्चित कहा गया है॥15॥
 
Although destiny and effort are considered to be the two common causes for the success of a task, I consider effort to be the most important factor. Destiny is said to be already fixed.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)