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mahabharat 12.56.14: हे युधिष्ठिर! पुत्र! तुम्हें सदैव पुरुषार्थ के लिए प्रयत्न करना चाहिए। पुरुषार्थ के बिना भाग्य ही राजाओं का उद्देश्य पूरा नहीं कर सकता।॥14॥   |   mahabharat अध्याय 12.56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.56.14 
उत्थानेन सदा पुत्र प्रयतेथा युधिष्ठिर।
न ह्युत्थानमृते दैवं राज्ञामर्थं प्रसादयेत्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे युधिष्ठिर! पुत्र! तुम्हें सदैव पुरुषार्थ के लिए प्रयत्न करना चाहिए। पुरुषार्थ के बिना भाग्य ही राजाओं का उद्देश्य पूरा नहीं कर सकता।॥14॥
 
Son Yudhishthira! You should always strive for purusharth. Without purusharth, destiny alone cannot fulfill the purpose of kings.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)