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mahabharat 12.56.13: देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा करने से राजा धर्म के ऋण से मुक्त हो जाता है और सारा संसार उसका आदर करता है ॥13॥   |   mahabharat अध्याय 12.56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 56: युधिष्ठिरके पूछनेपर भीष्मके द्वारा राजधर्मका वर्णन, राजाके लिये पुरुषार्थ और सत्यकी आवश्यकता, ब्राह्मणोंकी अदण्डनीयता तथा राजाकी परिहासशीलता और मृदुतासे प्रकट होनेवाले दोष  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.56.13 
दैवतान्यर्चयित्वा हि ब्राह्मणांश्च कुरूद्वह।
आनृण्यं याति धर्मस्य लोकेन च समर्च्यते॥ १३॥
 
 
अनुवाद
देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा करने से राजा धर्म के ऋण से मुक्त हो जाता है और सारा संसार उसका आदर करता है ॥13॥
 
By worshipping the gods and brahmins, the king is freed from the debt of religion and the entire world respects him. ॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)