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mahabharat 12.54.38-39: हे प्रभु! जो मनुष्य सत्य को जानते हुए भी भक्तिपूर्वक पूछने वाले को उपदेश नहीं देता, वह अत्यन्त दुःखदायी पाप का भागी होता है; इसलिए हे भरतश्रेष्ठ! जब आपके पुत्र-पौत्र धर्म जानने की इच्छा से पूछें, तो उन्हें सनातन धर्म का उपदेश दीजिए; क्योंकि आप शास्त्रों के ज्ञाता हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.54: भगवान् श्रीकृष्ण और भीष्मजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 54: भगवान् श्रीकृष्ण और भीष्मजीकी बातचीत  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  12.54.38-39 
अप्रतिब्रुवत: कष्टो दोषो हि भविता प्रभो॥ ३८॥
तस्मात् पुत्रैश्च पौत्रैश्च धर्मान् पृष्टान् सनातनान्।
विद्वाञ्जिज्ञासमानैस्त्वं प्रब्रूहि भरतर्षभ॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! जो मनुष्य सत्य को जानते हुए भी भक्तिपूर्वक पूछने वाले को उपदेश नहीं देता, वह अत्यन्त दुःखदायी पाप का भागी होता है; इसलिए हे भरतश्रेष्ठ! जब आपके पुत्र-पौत्र धर्म जानने की इच्छा से पूछें, तो उन्हें सनातन धर्म का उपदेश दीजिए; क्योंकि आप शास्त्रों के ज्ञाता हैं।
 
Lord! A man who, despite knowing the truth, does not instruct the one who asks with devotion, incurs a very painful sin; therefore, O best of the Bharatas! When your sons and grandsons, who desire to know the Dharma, ask for it, instruct them on the Sanatan Dharma; because you are a scholar of the scriptures.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कृष्णवाक्ये चतु:पञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें श्रीकृष्ण-वाक्यविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५४॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)