श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 54: भगवान् श्रीकृष्ण और भीष्मजीकी बातचीत  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.54.17 
भीष्म उवाच
दाहो मोह: श्रमश्चैव क्लमोग्लानिस्तथा रुजा।
तव प्रसादाद् वार्ष्णेय सद्य: प्रतिगतानि मे॥ १७॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी बोले - वृष्णिनन्दन ! आपकी कृपा से मेरे शरीर की जलन, मन की आसक्ति, थकावट, क्लेश, ग्लानि और रोग - ये सब तत्काल दूर हो गए ॥17॥
 
Bhishmaji said – Vrishninandan! By your grace, the burning sensation in my body, attachment to the mind, tiredness, distress, guilt and disease – all these went away immediately. 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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