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mahabharat 12.52.25: शीतल, सुखद, मंद, शुद्ध और पूर्णतया सुगन्धित वायु बह रही थी, समस्त दिशाएँ शान्त थीं और उनमें रहने वाले पशु-पक्षी शान्तिपूर्वक मधुर वाणी बोल रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 12.52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.52.25 
ववौ शिव: सुखो वायु: सर्वगन्धवह: शुचि:।
शान्तायां दिशि शान्ताश्च प्रावदन् मृगपक्षिण:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
शीतल, सुखद, मंद, शुद्ध और पूर्णतया सुगन्धित वायु बह रही थी, समस्त दिशाएँ शान्त थीं और उनमें रहने वाले पशु-पक्षी शान्तिपूर्वक मधुर वाणी बोल रहे थे।
 
A cool, pleasant, slow, pure and completely fragrant wind was blowing, all directions were calm and the animals and birds living in them were speaking pleasant words peacefully. 25.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)