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mahabharat 12.52.2: लोकनाथ! महाबाहो! शिव! नारायण! अच्युत! आपके वचन सुनकर मैं आनंद के सागर में डूब गया हूँ॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 12.52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.52.2 
लोकनाथ महाबाहो शिव नारायणाच्युत।
तव वाक्यमुपश्रुत्य हर्षेणास्मि परिप्लुत:॥ २॥
 
 
अनुवाद
लोकनाथ! महाबाहो! शिव! नारायण! अच्युत! आपके वचन सुनकर मैं आनंद के सागर में डूब गया हूँ॥ 2॥
 
‘Loknath! Mahabaho! Shiva! Narayan! Achyuta! Hearing your words, I have become immersed in the ocean of bliss.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)