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श्लोक 12.50.38  |
स पाण्डवेयस्य मन:समुत्थितं
नरेन्द्र शोकं व्यपकर्ष मेधया।
भवद्विधा ह्युत्तमबुद्धिविस्तरा
विमुह्यमानस्य नरस्य शान्तये॥ ३८॥ |
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| अनुवाद |
| नरेन्द्र! आप अपनी बुद्धि से पाण्डवपुत्र युधिष्ठिर के हृदय में उमड़े हुए शोक को दूर कीजिए। आपके समान महान् ज्ञानी पुरुष ही मोहग्रस्त मनुष्य के दुःख और पीड़ा को दूर करके उसे शांति प्रदान कर सकते हैं।॥38॥ |
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| 'Narendra! Please remove the sorrow that has welled up in the heart of Yudhishthira, the son of Pandava, by your wisdom. Only a person with a great wisdom like you can remove the sorrow and pain of a bewildered person and give him peace.'॥ 38॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कृष्णवाक्ये पञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५०॥
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