श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 50: श्रीकृष्णद्वारा भीष्मजीके गुण-प्रभावका सविस्तर वर्णन  »  श्लोक 33-34h
 
 
श्लोक  12.50.33-34h 
योगे सांख्ये च नियता ये च धर्मा: सनातना:।
चातुर्वर्ण्यस्य यश्चोक्तो धर्मो न स्म विरुध्यते॥ ३३॥
सेव्यमान: सवैयाख्यो गाङ्गेय विदितस्तव।
 
 
अनुवाद
गंगानंदन! योग और सांख्य में जो सनातन धर्म बताया गया है तथा चारों वर्णों के लिए जो अविरोधी धर्म बताया गया है, जिसका पालन सब लोग करते हैं, वह सब आपको व्याख्या सहित ज्ञात है। ॥33 1/2॥
 
'Ganga Nandan! The eternal Dharma which is prescribed in Yoga and Sankhya and the non-contradictory Dharma which has been described for the four Varnas, which is followed by all people, all of it is known to you along with its explanation. ॥ 33 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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