श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 50: श्रीकृष्णद्वारा भीष्मजीके गुण-प्रभावका सविस्तर वर्णन  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  12.50.31-32 
ये हि धर्मा: समाख्याताश्चातुर्वर्ण्यस्य भारत॥ ३१॥
चातुराश्रम्यसंयुक्ता: सर्वे ते विदितास्तव।
चातुर्विद्ये च ये प्रोक्ताश्चातुर्होत्रे च भारत॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
‘भारत! चारों वर्णों और आश्रमों के लिए जो धर्म शास्त्रों में कहे गए हैं, वे सब तुम्हें ज्ञात हैं। चारों विद्याओं में जो धर्म बताए गए हैं, तथा चारों होताओं के जो कर्तव्य बताए गए हैं, वे भी तुम्हें ज्ञात हैं।॥31-32॥
 
‘Bharat! All the dharmas that have been mentioned in the scriptures for the four Varnas and Ashramas are known to you. The dharmas that have been explained in the four Vidyas and the duties of the four Hotas are also known to you.॥ 31-32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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