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श्लोक 12.50.28  |
मनुष्येषु मनुष्येन्द्र न दृष्टो न च मे श्रुत:।
भवतो वा गुणैर्युक्त: पृथिव्यां पुरुष: क्वचित् ॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| नरेन्द्र! इस पृथ्वी पर मैंने न तो किसी ऐसे मनुष्य को देखा है और न सुना है, जिसमें तुम्हारे समान गुण हों॥ 28॥ |
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| 'Narendra! I have neither seen nor heard of any human being on this earth who has qualities like yours.॥ 28॥ |
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