श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 50: श्रीकृष्णद्वारा भीष्मजीके गुण-प्रभावका सविस्तर वर्णन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.50.19 
संहारश्चैव भूतानां धर्मस्य च फलोदय:।
विदितस्ते महाप्राज्ञ त्वं हि धर्ममयो निधि:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
हे महात्मन! जीव कब मरते हैं? धर्म का फल क्या है? और वह कब उत्पन्न होता है? ये सब बातें आपको ज्ञात हैं; क्योंकि आप धर्म के प्रचुर भण्डार हैं॥19॥
 
‘O great one! When do creatures die? What is the fruit of Dharma? And when does it arise? All these things are known to you; because you are the abundant storehouse of Dharma.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)