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श्लोक 12.50.16  |
सुसूक्ष्मोऽपि तु देहे वै शल्यो जनयते रुजम्।
किं पुन: शरसंघातैश्चित्तस्य तव पार्थिव॥ १६॥ |
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| अनुवाद |
| राजन्! यदि आपके शरीर में छोटे-से-छोटा काँटा भी चुभ जाए, तो वह अत्यन्त पीड़ा देता है। फिर बाणों के समूह से बिंधे हुए आपके शरीर की पीड़ा के विषय में क्या कहा जा सकता है?॥16॥ |
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| ‘King! If even the tiniest of thorns pierces your body, it causes immense pain. Then what can be said about the pain of your body which has been pierced by a group of arrows?॥ 16॥ |
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