श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 43: युधिष्ठिरद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.43.4 
त्वामेकमाहु: पुरुषं त्वामाहु: सात्वतां पतिम्।
नामभिस्त्वां बहुविधै: स्तुवन्ति प्रयता द्विजा:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण अपने मन और इन्द्रियों को वश में रखते हैं, वे आपको ही सर्वज्ञ और पूजन करने वाले भक्तों का रक्षक मानते हैं। वे नाना नामों से आपकी स्तुति भी करते हैं॥4॥
 
‘The Brahmins who control their mind and senses consider you alone as the omniscient being and the protector of the devotees who worship you. They also praise you by various names.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)