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mahabharat 12.363.6: ब्रह्मन्! मैंने सौरमण्डल में ऐसा चमत्कार देखा था कि जो मनुष्य अपने सदाचार से सिद्ध हो गया, उसने अपनी इच्छानुसार सिद्धि प्राप्त कर ली। हे ब्रह्मन्! अब वह सूर्य के साथ रहकर सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करता है।   |   mahabharat अध्याय 12.363: उञ्छ एवं शिलवृत्तिसे सिद्ध हुए पुरुषकी दिव्य गति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 363: उञ्छ एवं शिलवृत्तिसे सिद्ध हुए पुरुषकी दिव्य गति  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.363.6 
एतदेवंविधं दृष्टमाश्चर्यं तत्र मे द्विज।
संसिद्धो मानुष: कामं योऽसौ सिद्धगतिं गत:।
सूर्येण सहितो ब्रह्मन् पृथिवीं परिवर्तते॥ ६॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मन्! मैंने सौरमण्डल में ऐसा चमत्कार देखा था कि जो मनुष्य अपने सदाचार से सिद्ध हो गया, उसने अपनी इच्छानुसार सिद्धि प्राप्त कर ली। हे ब्रह्मन्! अब वह सूर्य के साथ रहकर सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करता है।
 
Brahmin! I had seen such a miracle in the solar system that the man who was accomplished by his upright behaviour attained the state of perfection as per his wish. O Brahman! Now he stays with the sun and revolves around the whole earth.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने त्रिषष्टॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३६३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)