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mahabharat 12.363.4: नागराज! इन ब्राह्मणों ने असंग रहकर सांसारिक इच्छाओं का त्याग कर दिया था और सदैव उच्चा और शीलवृत्ति से प्राप्त अन्न का ही सेवन करते थे। वे निरन्तर समस्त प्राणियों के कल्याण में लगे रहते थे। 4॥   |   mahabharat अध्याय 12.363: उञ्छ एवं शिलवृत्तिसे सिद्ध हुए पुरुषकी दिव्य गति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 363: उञ्छ एवं शिलवृत्तिसे सिद्ध हुए पुरुषकी दिव्य गति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.363.4 
असङ्गतिरनाकाङ्क्षी नित्यमुञ्छशिलाशन:।
सर्वभूतहिते युक्त एष विप्रो भुजङ्गम॥ ४॥
 
 
अनुवाद
नागराज! इन ब्राह्मणों ने असंग रहकर सांसारिक इच्छाओं का त्याग कर दिया था और सदैव उच्चा और शीलवृत्ति से प्राप्त अन्न का ही सेवन करते थे। वे निरन्तर समस्त प्राणियों के कल्याण में लगे रहते थे। 4॥
 
Nagraj! These Brahmins had renounced worldly desires by living asangs and always ate only the food obtained from Ucchha* and Shilvrittis. He was constantly engaged in the welfare of all living beings. 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)