श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  12.36.50 
एतत् ते कथितं सर्वं यथावृत्तं युधिष्ठिर।
समासेन महद्धॺेतच्छ्रोतव्यं भरतर्षभ॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
हे भरत के गौरव युधिष्ठिर! यह सम्पूर्ण कथा संक्षेप में तथा यथावत् आपसे कही गई है। इस महत्त्वपूर्ण घटना को सभी लोग सुनें ॥50॥
 
Yudhishthira, the pride of Bharata! This entire story has been told to you in brief and in its original form. Everyone should listen to this important incident. ॥ 50॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्यासवाक्ये षट्‍‍त्रिंशोऽध्याय:॥ ३६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्यासवाक्यविषयकछत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)