श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.36.48 
ग्रामो धान्यैर्यथा शून्यो यथा कूपश्च निर्जल:।
यथा हुतमनग्नौ च तथैव स्यान्निराकृतौ॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
जैसे अन्न रहित गाँव, जल रहित कुआँ और राख में किया गया हवन सब व्यर्थ है, वैसे ही मूर्ख ब्राह्मण को दिया गया दान भी व्यर्थ है॥ 48॥
 
'Just as a village without food, a well without water and an oblation made in ashes are all useless, similarly a donation given to a foolish Brahmin is also useless.॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)