श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  12.36.43 
निर्मन्त्रो निर्वृतो य: स्यादशास्त्रज्ञोऽनसूयक:।
अनुक्रोशात् प्रदातव्यं हीनेष्वव्रतिकेषु च॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण वेद-शास्त्रों के ज्ञान से रहित होने पर भी दूसरों में दोष नहीं देखता और संतुष्ट रहता है, उसे दयापूर्वक दान देना चाहिए, तथा व्रत से रहित दीन-दुखियों को भी दान देना चाहिए॥ 43॥
 
'A Brahmin who, despite being devoid of the knowledge of Vedas and scriptures, does not find faults in others and remains satisfied, should be compassionately given alms as well as to the poor and downtrodden who are devoid of vows.॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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