श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.36.28 
विष्ठा वार्धुषिकस्यान्नं गणिकान्नमथेन्द्रियम्।
मृष्यन्ति ये चोपपतिं स्त्रीजितान्नं च सर्वश:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
सूदखोर का भोजन मल के समान है और वेश्या का भोजन वीर्य के समान है। जो कायर अपनी पत्नी के पास दूसरे पति का आना सहन कर लेते हैं और जो पुरुष सदैव अपनी स्त्रियों के वश में रहते हैं, उनका भोजन भी वीर्य के समान है।॥28॥
 
‘The food of a usurer is like feces and the food of a prostitute is like semen. The food of those cowards who tolerate the coming of a second husband to their wife and of men who are always under the control of their women is also like semen.॥ 28॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas