| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन » श्लोक 10 |
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| | | | श्लोक 12.36.10  | अदत्तस्यानुपादानं दानमध्ययनं तप:।
अहिंसा सत्यमक्रोध इज्या धर्मस्य लक्षणम्॥ १०॥ | | | | | | अनुवाद | | ‘अर्पित वस्तु न लेना, दान, स्वाध्याय और तप में तत्पर रहना, किसी प्राणी को कष्ट न देना, सत्य बोलना, क्रोध का त्याग करना और यज्ञ करना - ये सब धर्म के लक्षण हैं।॥10॥ | | | | ‘Not taking anything that is not offered, being devoted to charity, study and austerity, not harming any living being, speaking the truth, giving up anger and performing sacrifices - all these are the signs of religion.॥ 10॥ | | ✨ ai-generated | | |
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