Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.354.16: इस संसार में धर्म के अनेक द्वार खुले हैं; उनके कारण मेरी बुद्धि भी उसी प्रकार व्याकुल और चंचल हो गई है, जैसे वायु के वेग से बादल व्याकुल हो जाते हैं। | mahabharat अध्याय 12.354: अतिथिद्वारा स्वर्गके विभिन्न मार्गोंका कथन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
एवं बहुविधैर्लोकैर्धर्मद्वारैरनावृतै:।
ममापि मतिराविग्ना मेघलेखेव वायुना॥ १६॥
अनुवाद
इस संसार में धर्म के अनेक द्वार खुले हैं; उनके कारण मेरी बुद्धि भी उसी प्रकार व्याकुल और चंचल हो गई है, जैसे वायु के वेग से बादल व्याकुल हो जाते हैं।
In this world, many doors of Dharma are open; because of them, my intellect too has become agitated and restless, like clouds are agitated by the wind.
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने चतु:पञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३५४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५४॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥