|
| |
| |
श्लोक 12.353.7  |
किन्नु मे स्याच्छुभं कृत्वा किं कृतं किं परायणम्।
इत्येवं खिद्यते नित्यं न च याति विनिश्चयम्॥ ७॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| मेरा क्या हित होगा? मेरा क्या कर्तव्य है और मेरा परम आश्रय कौन है?’ यह सोचकर वह व्याकुल हो जाता था; परन्तु किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पाता था॥7॥ |
| |
| What will be good for me? What is my duty and who is my ultimate refuge?' He used to get upset thinking about this; but he was unable to reach any decision.॥ 7॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|