श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 353: महापद्मपुरमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मणके सदाचारका वर्णन और उसके घरपर अतिथिका आगमन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.353.7 
किन्नु मे स्याच्छुभं कृत्वा किं कृतं किं परायणम्।
इत्येवं खिद्यते नित्यं न च याति विनिश्चयम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
मेरा क्या हित होगा? मेरा क्या कर्तव्य है और मेरा परम आश्रय कौन है?’ यह सोचकर वह व्याकुल हो जाता था; परन्तु किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पाता था॥7॥
 
What will be good for me? What is my duty and who is my ultimate refuge?' He used to get upset thinking about this; but he was unable to reach any decision.॥ 7॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas