श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 353: महापद्मपुरमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मणके सदाचारका वर्णन और उसके घरपर अतिथिका आगमन  »  श्लोक 1-3
 
 
श्लोक  12.353.1-3 
भीष्म उवाच
आसीत् किल नरश्रेष्ठ महापद्मे पुरोत्तमे।
गङ्गाया दक्षिणे तीरे कश्चिद् विप्र: समाहित:॥ १॥
सौम्य: सोमान्वये वेदे गताध्वा छिन्नसंशय:।
धर्मनित्यो जितक्रोधो नित्यतृप्तो जितेन्द्रिय:॥ २॥
तप:स्वाध्यायनिरत: सत्य: सज्जनसम्मत:।
न्यायप्राप्तेन वित्तेन स्वेन शीलेन चान्वित:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - हे पुरुषोत्तम युधिष्ठिर! (नारद जी द्वारा कही गई कथा इस प्रकार है -) गंगा के दक्षिणी तट पर महापद्म नामक एक महान नगर है। वहाँ एक ब्राह्मण रहता था। वह एकाग्रचित्त और सौम्य स्वभाव का व्यक्ति था। उसका जन्म अत्रि गोत्र के चन्द्रमा कुल में हुआ था। वह वेदों का अच्छा ज्ञाता था और उसके मन में किसी प्रकार का संशय नहीं था। वह सदैव धार्मिक, क्रोधरहित, सदैव संतुष्ट, आत्मसंयमी, तप और स्वाध्याय में तत्पर, सत्यवादी और सज्जनों द्वारा आदरणीय था। उसे न्याय से अर्जित धन और ब्राह्मण-सदृश चरित्र का वरदान प्राप्त था। 1-3।
 
Bhishma says - Yudhishthira, the best of men! (The story told by Narad is as follows -) There is a great city named Mahapadma on the southern bank of the Ganga. A Brahmin lived there. He was a man of concentrated mind and gentle nature. He was born in the family of Chandrama - Atri Gotra. He was well versed in the Vedas and there was no doubt in his mind. He was always religious, anger-free, always satisfied, self-controlled, engaged in penance and self-study, truthful and was respected by good people. He was blessed with wealth earned through justice and his Brahmin-like character. 1-3.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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