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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 35: पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  12.35.31 
पादजोच्छिष्टकांस्यं यद् गवा घ्रातमथापि वा।
गण्डूषोच्छिष्टमपि वा विशुध्येद् दशभिस्तु तत्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
यदि पीतल का बर्तन किसी शूद्र के द्वारा अपवित्र कर दिया जाए, या गाय उसे सूंघ ले, या किसी के कुल्ला करने से अपवित्र हो जाए, तो दस वस्तुओं से शुद्ध करने पर वह पुनः शुद्ध हो जाता है।
 
If a brass vessel is made impure by a shudra, or a cow smells it, or if it becomes impure by somebody gargling with it, it becomes pure again after purifying it with ten things.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)