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mahabharat 12.35.20-21h: जिस व्यक्ति ने गुरुपत्नी के साथ संभोग किया हो, उसे या तो गर्म लोहे की शिला पर लेट जाना चाहिए अथवा अपनी मूत्रेन्द्रिय को काटकर ऊपर की ओर देखते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए। इस प्रकार शरीर त्यागने के पश्चात वह उस पापकर्म से मुक्त हो जाता है।   |   mahabharat अध्याय 12.35: पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 35: पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन  »  श्लोक 20-21h
 
 
श्लोक  12.35.20-21h 
गुरुतल्पी शिलां तप्तामायसीमभिसंविशेत् ।
अवकृत्यात्मन: शेफं प्रव्रजेदूर्ध्वदर्शन:॥ २०॥
शरीरस्य विमोक्षेण मुच्यते कर्मणोऽशुभात् ।
 
 
अनुवाद
जिस व्यक्ति ने गुरुपत्नी के साथ संभोग किया हो, उसे या तो गर्म लोहे की शिला पर लेट जाना चाहिए अथवा अपनी मूत्रेन्द्रिय को काटकर ऊपर की ओर देखते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए। इस प्रकार शरीर त्यागने के पश्चात वह उस पापकर्म से मुक्त हो जाता है।
 
A person who has had sexual relations with his Guru's wife should either lie down on a heated iron rock or he should cut off his urinary organ and keep moving forward looking upwards. In this way, after leaving the body, he is freed from that sinful act.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)