श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 348: सात्वत-धर्मकी उपदेश-परम्परा तथा भगवान् के प्रति ऐकान्तिक भावकी महिमा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.348.2 
ये तु दग्धेन्धना लोके पुण्यपापविवर्जिता:।
तेषां त्वयाभिनिर्दिष्टा पारम्पर्यागता गति:॥ २॥
 
 
अनुवाद
आपने इस संसार में उन लोगों की स्थिति का भी वर्णन किया है जिनकी इच्छाएं जल गई हैं और जो पाप-पुण्य से मुक्त हो गए हैं।
 
You have also described the state of affairs that is attained by those people in this world whose desires have been burnt and who have become free from sins and virtues.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)