श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 96
 
 
श्लोक  12.347.96 
नैवास्य विन्दन्ति गतिं महात्मनो
न चागतिं कश्चिदिहानुपश्यति।
ज्ञानात्मका: सन्ति हि ये महर्षय:
पश्यन्ति नित्यं पुरुषं गुणाधिकम्॥ ९६॥
 
 
अनुवाद
उस महात्मा की गति को कोई नहीं जानता। यहाँ किसी को भी उसके आगमन का कुछ पता नहीं। जो ज्ञानस्वरूप महर्षि हैं, वे ही उस अनादि, अन्तर्यामी और सनातन ईश्वर को अनुभव करते हैं।
 
No one knows the movements of that Mahatma. No one here knows anything about his arrival. Only those who are Maharishis in the form of knowledge, realize that eternal, inner and eternal God.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये सप्तचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३४७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)