श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  12.347.95 
अयं हि नित्य: परमो महर्षि-
र्महाविभूतिर्गुणवर्जिताख्य:।
गुणैश्च संयोगमुपैति शीघ्रं
कालो यथर्तावृतुसम्प्रयुक्त:॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
ये परम महर्षि नारायण सनातन, महान ऐश्वर्य से युक्त और निर्गुण हैं; तथापि जैसे निर्गुण काल ​​ऋतुओं के गुणों से युक्त रहता है, वैसे ही ये भी समय-समय पर गुणों को ग्रहण करके उनसे युक्त हो जाते हैं ॥95॥
 
This Supreme Maharishi Narayana is eternal, full of great opulence and devoid of qualities, however, just as the qualityless time is filled with the qualities of the seasons, in the same way He also accepts the qualities from time to time and gets united with them. 95॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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