श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 93-94
 
 
श्लोक  12.347.93-94 
ये केचित् सर्वलोकेषु दैवं पित्र्यं च कुर्वते।
दानानि च प्रयच्छन्ति तप्यन्ते च तपो महत्॥ ९३॥
सर्वेषामाश्रयो विष्णुरैश्वरं विधिमास्थित:।
सर्वभूतकृतावासो वासुदेवेति चोच्यते॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
सम्पूर्ण जगत में जो कोई देवताओं के लिए यज्ञ और पितरों के लिए श्राद्ध करता है, दान देता है और महान तप करता है, भगवान विष्णु उन सबके आश्रय हैं। वे अपने ऐश्वर्य में स्थित रहते हैं। समस्त प्राणियों के निवासस्थान होने के कारण उन्हें 'वासुदेव' कहा जाता है। 93-94
 
In the entire world, whoever performs Yagya for the gods and Shraddha for the ancestors, gives charity and does great penance, Lord Vishnu is the shelter of all of them. He remains situated in his opulence. Being the abode of all living beings, he is called 'Vasudev'. 93-94.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)