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mahabharat 12.347.57-58: राजन! इतने में ही भगवान हरि ने हयग्रीव रूप धारण करके पाताल में पड़े हुए उन समस्त वेदों को लेकर ब्रह्माजी को लौटा दिया और फिर वे अपने मूल स्वरूप में आ गए ॥57-58॥   |   mahabharat अध्याय 12.347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 57-58
 
 
श्लोक  12.347.57-58 
एतस्मिन्नन्तरे राजन् देवो हयशिरोधर:॥ ५७॥
जग्राह वेदानखिलान् रसातल गतान् हरि:।
प्रादाच्च ब्रह्मणे भूयस्तत: स्वां प्रकृतिं गत:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
राजन! इतने में ही भगवान हरि ने हयग्रीव रूप धारण करके पाताल में पड़े हुए उन समस्त वेदों को लेकर ब्रह्माजी को लौटा दिया और फिर वे अपने मूल स्वरूप में आ गए ॥57-58॥
 
King! In the meanwhile Lord Hari in the form of Hayagriva took all those Vedas lying in the netherworld and returned them to Brahmaji and then he came back to his original form. ॥ 57-58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)