श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 45-46h
 
 
श्लोक  12.347.45-46h 
त्वया विनिर्मितोऽहं वै वेदचक्षुर्वयोतिग:।
ते मे वेदा हृताश्चक्षुरन्धो जातोऽस्मि जागृहि॥ ४५॥
ददस्व चक्षूंषि मम प्रियोऽहं ते प्रियोऽसि मे।
 
 
अनुवाद
आपने मुझे वेद रूपी नेत्र प्रदान किए हैं। आपकी कृपा से ही मैं काल से परे हूँ। काल का मुझ पर कोई अधिकार नहीं है। वेद रूपी नेत्र राक्षसों ने छीन लिए हैं, इसलिए मैं अंधा हो गया हूँ। हे प्रभु! अपनी निद्रा से जागो। मुझे मेरे नेत्र लौटा दो; क्योंकि मैं आपका प्रिय भक्त हूँ और आप मेरे प्रिय प्रभु हैं। ॥45 1/2॥
 
You have blessed me with the Vedas as my eyes. It is by Your grace that I am beyond time. Time has no power over me. The Vedas as my eyes have been taken away by demons; therefore I have become blind. Lord! Wake up from your sleep. Give me back my eyes; because I am Your beloved devotee and You are my beloved Lord. ॥ 45 1/2 ॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)