श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 36-37
 
 
श्लोक  12.347.36-37 
इत्येवं भाषमाणस्य ब्रह्मणो नृपसत्तम॥ ३६॥
हरे: स्तोत्रार्थमुद्भूता बुद्धिर्बुद्धिमतां वर।
ततो जगौ परं जप्यं साञ्जलिप्रग्रह: प्रभु:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
हे श्रेष्ठ! ऐसी बातें कहकर ब्रह्माजी के मन में भगवान श्रीहरि की स्तुति करने का विचार उत्पन्न हुआ। हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राजा! तब भगवान ब्रह्माजी हाथ जोड़कर उत्तम एवं जपने योग्य स्तोत्र का गान करने लगे। 36-37॥
 
The best! Saying such things, the thought of praising Lord Shri Hari arose in Brahmaji's mind. The foremost king among the wise! Then Lord Brahma, with folded hands, started singing the excellent and chantable stotra. 36-37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)