| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन » श्लोक 22-23 |
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| | | | श्लोक 12.347.22-23  | पद्मेऽनिरुद्धात् सम्भूतस्तदा पद्मनिभेक्षण:।
सहस्रपत्रे द्युतिमानुपविष्ट: सनातन:॥ २२॥
ददृशेऽद्भुतसंकाशो लोकानापोमयान् प्रभु:।
सत्त्वस्थ: परमेष्ठी स ततो भूतगणान् सृजन्॥ २३॥ | | | | | | अनुवाद | | उस समय ब्रह्माण्डरूपी कमल में अनिरुद्ध (अहंकार) से कमलनेत्र ब्रह्माजी प्रकट हुए थे। सहस्रदल कमल पर विराजमान अद्भुत सुन्दर एवं तेजस्वी सनातन भगवान ब्रह्माजी जब इधर-उधर देखने लगे, तो उन्हें सारा जगत जल से आच्छादित दिखाई दिया। तब सत्त्वगुण में स्थित ब्रह्माजी ने जीवों की रचना आरम्भ की। 22-23॥ | | | | At that time, lotus-eyed Brahma had emerged from Aniruddha (ego) in the lotus of the universe. When that amazingly beautiful and brilliant eternal Lord Brahma, seated on a thousand-petalled lotus, started looking here and there, he saw the entire world covered in water. Then Brahmaji, being situated in Sattva Guna, started creating living beings. 22-23॥ | | ✨ ai-generated | | |
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