Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.347.20-21: उस समय वे नाना गुणों से उत्पन्न जगत् की अद्भुत रचना के विषय में सोचने लगे। सृष्टि का विचार करते-करते उन्हें अपने महान गुण (महत्तत्त्व) का स्मरण हो आया। उससे अहंकार प्रकट हुआ। वह अहंकार ही चतुर्मुख ब्रह्माजी हैं, जो समस्त लोकों के पितामह और भगवान हिरण्यगर्भ के नाम से प्रसिद्ध हैं। 20-21॥ | mahabharat अध्याय 12.347: हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
जगतश्चिन्तयन् सृष्टिं चित्रां बहुगुणोद्भवाम्।
तस्य चिन्तयत: सृष्टिं महानात्मगुण: स्मृत:॥ २०॥
अहंकारस्ततो जातो ब्रह्मा स तु चतुर्मुख:।
हिरण्यगर्भो भगवान् सर्वलोकपितामह:॥ २१॥
अनुवाद
उस समय वे नाना गुणों से उत्पन्न जगत् की अद्भुत रचना के विषय में सोचने लगे। सृष्टि का विचार करते-करते उन्हें अपने महान गुण (महत्तत्त्व) का स्मरण हो आया। उससे अहंकार प्रकट हुआ। वह अहंकार ही चतुर्मुख ब्रह्माजी हैं, जो समस्त लोकों के पितामह और भगवान हिरण्यगर्भ के नाम से प्रसिद्ध हैं। 20-21॥
At that time he started thinking about the wonderful creation of the world arising from various qualities. While thinking about the creation, he remembered his great quality (Mahatattva). That revealed arrogance. That ego itself is the four-faced Brahmaji, who is famous by the name of Grandfather of all the worlds and Lord Hiranyagarbha. 20-21॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥