vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 345: भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना
»
श्लोक 22
श्लोक
12.345.22
नास्ति मत्तोऽधिक: कश्चित् को वान्योऽर्च्यो मया स्वयम्।
को वा मम पिता लोके अहमेव पितामह:॥ २२॥
अनुवाद
मुझसे श्रेष्ठ कोई नहीं है; फिर मैं किसकी पूजा करूँ? इस संसार में मेरा पिता कौन है? मैं सबका पितामह हूँ॥ 22॥
There is no one superior to me; then who is there whom I should worship? Who is my father in this world? I am the grandfather of all.॥ 22॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×