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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 345: भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना
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श्लोक 21
श्लोक
12.345.21
पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामह:।
अहमेवात्र विज्ञेयस्त्रिषु पिण्डेषु संस्थित:॥ २१॥
अनुवाद
पिता, पितामह और परदादा के रूप में मुझे इन तीन शरीरों में स्थित जानना चाहिए ॥21॥
In the form of father, grandfather and great grandfather, I should be known to be situated in these three bodies. 21॥
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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