श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 345: भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  12.345.2-3 
ततस्तं वचनं प्राह ज्येष्ठो धर्मात्मज: प्रभु:।
क इज्यते द्विजश्रेष्ठ दैवे पित्र्ये च कल्पिते॥ २॥
त्वया मतिमतां श्रेष्ठ तन्मे शंस यथागमम्।
किमेतत् क्रियते कर्म फलं वास्य किमिष्यते॥ ३॥
 
 
अनुवाद
तब धर्म के ज्येष्ठ पुत्र नर ने उनसे इस प्रकार पूछा - 'द्विजश्रेष्ठ! आप बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं। जब आप देवता और पितरों का कार्य करते हैं, तो उन कार्यों से किसकी पूजा सिद्ध होती है? शास्त्रानुसार यह बताइए। आप किस प्रकार का कार्य करते हैं? और इससे आप क्या फल प्राप्त करना चाहते हैं?' 2-3॥
 
Then Dharma's eldest son Nara asked him thus - 'Dwijashrestha! You are foremost among the wise. When you perform the works of God and ancestors, whose worship is accomplished through those works? Tell me this according to the scriptures. What kind of work do you do? And what result do you want to achieve through this? 2-3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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