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mahabharat 12.345.16-17: भगवान ने अपनी इच्छा से उन तीनों शरीरों का समाधान किया। फिर उन्होंने अपने शरीर की ऊष्मा से उत्पन्न प्रेममय तिलों द्वारा उन शरीरों का परीक्षण किया। तत्पश्चात् स्वयं देवेश्वर श्रीहरि ने पूर्वाभिमुख होकर प्रार्थना की और धर्म की मर्यादा की स्थापना के लिए यह कहा। 16-17॥   |   mahabharat अध्याय 12.345: भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 345: भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  12.345.16-17 
संकल्पयित्वा त्रीन् पिण्डान् स्वेनैव विधिना प्रभु:।
आत्मगात्रोष्मसम्भूतै: स्नेहगर्भैस्तिलैरपि॥ १६॥
प्रोक्ष्यापसव्यं देवेश: प्राङ्मुख: कृतवान् स्वयम्।
मर्यादास्थापनार्थं च ततो वचनमुक्तवान्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने अपनी इच्छा से उन तीनों शरीरों का समाधान किया। फिर उन्होंने अपने शरीर की ऊष्मा से उत्पन्न प्रेममय तिलों द्वारा उन शरीरों का परीक्षण किया। तत्पश्चात् स्वयं देवेश्वर श्रीहरि ने पूर्वाभिमुख होकर प्रार्थना की और धर्म की मर्यादा की स्थापना के लिए यह कहा। 16-17॥
 
By His own will, the Lord resolved those three bodies. Then he examined those bodies with the help of loving moles generated from the heat of his own body. Thereafter, Deveshwar Shri Hari himself faced east and prayed and said this for the establishment of religious dignity. 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)