श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 345: भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.345.10 
नूनं पुरैतद् विदितं युवयोर्भावितात्मनो:।
पुत्राश्च पितरश्चैव परस्परमपूजयन्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
पुत्र और पिता द्वारा एक-दूसरे के लिए की गई पूजा को तुम दोनों शुद्धात्माओं ने अवश्य ही पहले से ही जान लिया होगा ॥10॥
 
The worship performed by the sons and the fathers for each other must surely have been known to you two pure souls already. ॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)